गुरु पूर्णिमा_ Guru Purnima

Significance of Guru Purnima

Hindus attach paramount importance to spiritual gurus. Gurus are often equated with God and always regarded as a link between the individual and the Immortal. Just as the moon shines by reflecting the light of the sun, and glorifies it, all disciples can dazzle like the moon by gaining from their Gurus.

Guru Purnima falls on the day of full moon, Purnima, in the month of Ashadh (June–July) of the Shaka Samvat, Indian national calendar and Hindu calendar. Traditionally the festival is celebrated by Buddhists in honour of the lord Buddha who gave His first sermon on this day at Sarnath.buddha_guru purnima

Hindus celebrate it in honour of the great sage Vyasa, who is seen as one of the greatest gurus in ancient Hindu traditions and a symbol of the Guru-shishya tradition. Vyasa was not only believed to have been born on this day, but also to have started writing the Brahma Sutras on ashadha sudha padyami, which ends on this day. Their recitations are a dedication to him, and are organised on this day, which is also known as Vyasa Purnima. All Hindus are indebted to this ancient saint who edited the four Vedas, wrote the 18 Puranas, the Mahabharata and the Srimad Bhagavata. Vyasa even taught Dattatreya, who is regarded as the Guru of Gurus.

Guru Purnima is a festival traditionally celebrated by Hindus and Buddhists, marked by ritualistic veneration of the Guru, Guru Puja. The word Guru is derived from two words, ‘Gu’ and ‘Ru’. The Sanskrit root “Gu” means darkness or ignorance. “Ru” denotes the remover of that darkness. Therefore one who removes darkness of our ignorance is a Guru. Gurus are believed by many to be the most necessary part of lives. On this day, disciples offer puja or pay respect to their Guru. The festival is common to all spiritual traditions in Hinduism, where it is an expression of gratitude toward the teacher by his/her disciple.

On this day, all spiritual aspirants and devotees worship Vyasa in honor of his divine personage and all disciples perform a ‘puja’ of their respective spiritual preceptor or ‘Gurudevs’.

 

आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। गुरू पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरंभ में आती है। इस दिन गुरु पूर्णिमासे चार महीने तक परिव्राजक साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, ऐसे ही गुरुचरण में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।

यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और उन्होंने चारों वेदों की भी रचना की थी। इस कारण उनका एक नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। भक्तिकाल के संत घीसादास का भी जन्म इसी दिन हुआ था वे कबीरदास के शिष्य थे।

गुरु के संकल्प के बिना इतना बडा और कठिन शिव धनुष उठा पाना असंभव है । इसके विपरीत गुरु की प्राप्ति हो जाए, तो यह कर पाना सुलभ हो जाता है । श्री गुरुगीताcमें ‘गुरु’ संज्ञा की उत्पत्ति का वर्णन इस प्रकार किया गया है

गुकारस्त्वन्धकारश्च रुकारस्तेज उच्यते ।

अज्ञानग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशयः ।। – श्री गुरुगीता

 

शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है।अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ‘गुरु’ कहा जाता है। गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी। बल्कि सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है।

Check Also

LeT Div. Comdr killed in Handwara Encounter

A LeT Div. Comdr Abu Musa was killed in an encounter with police and Army …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *